Mystery of Kedarnath Temple | केदारनाथ मंदिर के रहस्य

 

 
          
 उत्तराखंड में हिमालय पर्वत की गोद में केदारनाथ मंदिर 12 ज्योतिर्लिंगों में सम्मिलित होने के साथ-साथ चारधाम, और पंच केदार में से भी एक है। यहां के मुश्किल मौसम के कारण यह मंदिर अप्रैल से नवंबर महीने के बीच ही खुलता है। कत्तोरी शैली में बने पत्थरों के इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण पांडव वंश के राजा जनमेजय ने कराया था। यहां स्थित स्वयंभू शिवलिंग अति प्राचीन है। कहा जाता है कि आठवीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। जून 2013 के दौरान भारत के उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश राज्यों में अचानक आई बाढ़ और भूस्खलन के कारण केदारनाथ सबसे अधिक प्रभावित रहा। इस ऐतिहासिक मंदिर का मुख्य हिस्सा और सदियों पुराना गुंबद सुरक्षित रहा, लेकिन मंदिर का प्रवेश द्वार और उसके आसपास का इलाका पूरी तरह तबाह हो गया। केदारनाथ मंदिर समुद्र तल से 11755 फीट की ऊंचाई पर स्थित है।

 दोस्तों जान लेते हैं किस तरह 400 सालों तक केदारनाथ का मंदिर वर्फ मे दवा रहा , ओर मंदिर पर इसका क्या असर पड़ा। वैज्ञानिकों के अनुसार केदारनाथ मंदिर 400 सालों तक वर्फ मे दवा रहा, फरभी इस मंदिर को कुछ नहीं हुआ, इसीलिए 2013 मे बाढ़ के दौरान इस मंदिर को कुछ ना होने पर वैज्ञानिकों को कोई हैरानी नहीं हुई। देहरादून के Wadia institute के हिमालयन जूलॉजिकल विजय जोशी ने कहा कि 400 साल तक केदारनाथ मंदिर वर्फ के अंदर दवे रहने के बावजुद सुरक्षित रहे, लेकिन जैसेही वर्फ पिछे हटी उसके निशान मंदिर में मौजूद थे, जिसकी के आधार पर यह पता लगा 400 सालों तक बर्फ में दबा हुआ था। जोशी कहते हैं कि 13 विं से 17 विं शताव्दि तक यानी 400 साल तक एक हिमयुग  आया था, जिसमें हिमालय का एक बड़ा क्षेत्र बर्फ के अंदर दब गया था। पहले माना जाता था कि मंदिर ग्लेशियर के अंदर है, लेकिन रिसर्च से पता चला कि यह मंदिर ग्लेशियर के अंदर नेही बल्कि वर्फ में ही दबा हुआ था। वैज्ञानिकों के अनुसार मंदिर की दीवार और पत्थरों पर आज भी उसके निशान है, यह निशान ग्लेशियर के रगड़ से बने हैं। ग्लेशियर हर वक्त खिसकते रहते हैं, वो ना सिर्फ सकते हैं बल्कि उनके साथ उनका वजन भी होता है, साथ ही कई चट्टानी भी उनके साथ होती हैं जिसके कारण उनके मार्ग में आई हर वस्तु रगड़ खाती हुई चली जाती है। जब 400 साल तक मंदिर बर्फ में दबा रहा होगा तो सोचिए मंदिर ग्लेशियर के वर्फ और पत्थर को कितना झेला होगा। वैज्ञानिकों के अनुसार मंदिर के अंदर भी उसके निशान दिखाई देते हैं। बाहर की ओर की दीवारों पर पत्थरों के रखती है तो अंदर की दीवारों पर पत्थर समतल है जैसे उनकी पॉलिश की गई हो। एक मत के अनुसार विक्रम संवत 1076 से 1099 तक राज करने वाले मालवा के राजा भोज ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था, लेकिन कुछ लोगों के अनुसार यह मंदिर आठवीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य ने बनवाया था। बताया जाता है कि मौजूदा केदारनाथ मंदिर के ठीक पीछे पान्डवो ने एक मंदिर बनवाया था, लेकिन यह मंदिर वक्त के थपेड़ों की मार सह नहीं पाये। वैसे गढ़वाल विकास निगम के अनुसार मौजूदा मंदिर आदि शंकराचार्य ने आठवीं शताब्दी में बनवाया था, यानी हिमयुग के दौरान जो कि 13 विं शताब्दी में शुरू हुआ था उससे पहले ही मंदिर वन चुका था। Wadia institute के वैज्ञानिकों ने केदारनाथ इलाके की Lichonometric dating भी की। इस तकनीक के अनुसार केदारनाथ के इलाके में ग्लेशियर का निर्माण 14विं सदी के मध्य में शुरू हुआ और इस घाटी में ग्लेशियर वनना 1748 तक जारी रहा, यानी तकरिबन 4000 सालों तक। जोशी ने कहा कि लाखों साल पहले चोरावारि  पीछे हटने से केदार घाटि वनी। यव ग्लेशियर पीछे हटते हैं अपने नीचे की सारी चट्टानों को रोड रोलार के तरह पीस देते हैं, और साथ में बड़ी-बड़ी चट्टानों के टुकड़े छोड़ जाते हैं। जोशी कहते हैं कि ऐसी जगह पर मंदिर बनाना engineering की एक अद्भुत नमुना है। उन्होंने एसी जगह मंदिर वनाय़ा है कि आज तक नुकसान नहीं हुआ। वैज्ञानिक Dr. R.K. Doval भी इस बात को मानते हैं कि यह मंदिर बहुत ही मजबूती से बनाया गया है। केदारनाथ मंदिर 85 फीट ऊंचा, 187 फीट लंबा, 80 फीट चौड़ा है। इसकी दीवारें 12 फीट मोटी है , ओर वेहद मजवुत पत्थरों से बनाई गई है। मंदिर को 6 फीट ऊंचे चबूतरे पर खड़ा किया गया है। यह भी एक हैरान करने वाली बात है कि इतने भारी भरकम पत्थरों को इतनी ऊंचाई पर लाकर और तराश कर कैसे एक मंदिर की शक्ल दी गई होगी। जानकारों का मानना है कि पत्थरों को एक दूसरे से जोड़ने के लिए इंटरलॉकिंग तकनीक का इस्तेमाल किया गया था, इसी वजह से यह मंदिर एक भूकंप रोधी इमारत में तब्दील हो गया। यह मजबूती और तकनीकी मंदिर को नदी के बीचो-बीच खड़े रखने में कामयाब हुई


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