वीर शिरोमणि Maharana Pratap ने जगंलो मे रहना पसन्द किया परन्तु मुगल सम्राट Akbar कि गुलामि नहीं की।

 


भारतीय इतिहास में राजपूतों का गौरवपूर्ण स्थान रहा है। इहां के रणबांकुरे ने देश जाति धर्म तथा स्वाधीनता की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान देने में भी कभी संकोच नहीं किया। उनके इस त्याग पर संपूर्ण भारत को गर्व रहा है। वीरों की इस भूमि में राजपूतों के छोटे बड़े अनेक राज्य रहे जिन्होंने भारत की स्वाधीनता के लिए संघर्ष किया। ईन्हि राज्यों में मेवाड़ का अपना एक विशेष स्थान है,  जिस पर इतिहास के गौरव Bappa Rawal, kumar pratham, maharana hammir, maharana kumbha, maharana sanga, Udai Singh और वीर शिरोमणि Maharana Pratap ने जन्म लिया है। मेवाड़ के महान राजपूत राजा Maharana Pratap अपने पराक्रम और शौर्य के लिए पूरी दुनिया में मिसाल के तौर पर जाने जाते हैं। एक ऐसा राजपूत सम्राट जिसने जंगलों में रहना पसंद किया, लेकिन कभी विदेशी मुगलों की दासतां स्वीकार नहीं की। उन्होंने देश धर्म और स्वाधीनता के लिए सब कुछ न्योछावर कर दिया। प्रताप के काल में दिल्ली में मुगल सम्राट Akbar का शासन था जो भारत के सभी राजा महाराजाओं को अपने अधीन कर मुगल साम्राज्य की स्थापना कर इस्लामिक परचम को पूरे हिंदुस्तान में फैराना चाहता था। इसके लिए उसने नीति और अनीति दोनों का ही सहारा लिया। 30 वर्षों के लगातार प्रयास के बावजूद Akbar Maharana Pratap को बंदी ना बना सका।

Maharana Pratap का जन्म 9 मई 1540 को राजस्थान के Kumbhalgarh Fort में हुआ था। उनके पिता महाराजा उदय सिंह द्वितीय और माता महारानी जयवंता बाई थी। बो Maharana Sanga के पोते थे। Maharana Pratap को बचपन में सभी कीका के नाम से पुकारा करते थे। जिस समय Maharana Pratap ने मेवाड़ की गद्दी संभाली उस समय राजपूताना साम्राज्य नाजुक दौर से गुजर रहा था। बादशाह Akbar की क्रुड़ःता के आगे कहीं राजपूत नरेश अपना सर झुका चुके थे। कई वीर प्रतापी राजवंशों के उच्च अधिकारियों ने अपनी कुल मर्यादा का सम्मान भुलाकर मुगलिया वंश से वैवाहिक संबंध स्थापित कर लिए थे। कुछ स्वाभिमानी राजघरानों के साथ ही Maharana Pratap भी अपने पूर्वजों की मर्यादा की रक्षा हेतु अटल थे, और इसीलिए मुगल बादशाह Akbar की आंखों में बो सदा खटकते रहते थे।

 Maharana Pratap जिस घोड़े पर बैठते थे वह घोड़ा दुनिया की सर्वश्रेष्ठ घोड़ों में से एक है। Maharana Pratap तव् 72 किलो का कवच पहनकर 81 किलो का भाला अपने हाथ में रखा करते थे। भाला कवच ढाल और दो तलवारों का वजन मिलाकर 208 किलो था। इतने वजन को उठाकर बो पूरे दिन युद्ध लड़ा करते थे। सोचिए तब उनकी शक्ति क्या रही होगी। इस वजन के साथ रणभूमि में दुश्मनों से पूरा दिन लड़ना मामूली बात नहीं थी। मेवाड़ को जीतने के लिए Akbar ने कई प्रयास किए। Akbar चाहता था कि Maharana Pratap अन्य राजाओं की तरह उसके कदमों में झुक जाए पर Maharana Pratap ने Akbar की अधीनता को कभी भी स्वीकार नहीं किया। अजमेर को अपना केंद्र बनाकर Akbar ने प्रताप के विरुद्ध सैनिक अभियान शुरू कर दिया। Maharana Pratap ने कई वर्षों तक मुगल सम्राट Akbar की सेना के साथ संघर्ष किया। मेवाड़ की धरती को मुगलों के आतंक से बचाने के लिए Maharana Pratap ने वीरता और शौर्य का परिचय दिया। प्रताप की वीरता ऐसे थी कि उनके दुश्मन भी उनके युद्ध कौशल के कायल थे। उदारता ऐसी कि दुश्मनों की पकड़ी गई पत्नियों को सम्मान के साथ उनके पास वापस भेज दिया करते थे। इतने साधन सीमित होने पर भी दुश्मन के सामने सिर नहीं झुकाया और जंगल के कंदमूल और घास की रोटियां खाकर लड़ते रहे। माना जाता है कि Maharana Pratap की मृत्यु पर Akbar की आंखें भी नम हो गई थी। Akbar ने भी कहा था कि देशभक्त हो तो Maharana Pratap जैसा।

 अपने विशाल मुगलिया सेना, बेमिसाल बारूद खाने,युद्ध की नवीन पद्धतियों के जानकारों से युक्त सलाहकारों, गुप्तचरों की लंबी फेहरिस्त, कूटनीति के उपरांत भी यब मुगल बादशाह Akbar समस्त प्रयासों के बाद भी Maharana Pratap को झुकाने में असफल रहा, तो उसने आमिर के महाराजा भगवान दास के भतीजे कुंवर मानसिंह (जिसकी बुआ जोधा वाई थी) को विशाल सेना के साथ डूंगरपुर और उदयपुर के शासकों को अधीनता स्वीकार करने हेतु विबश करने के लक्ष्य के साथ भेजा। मानसिंह की सेना के सामने डूंगरपुर राज्य अधिक प्रतिरोध नहीं कर सका। इसके बाद मानसिंह Maharana Pratap को समझाने के लिए उदयपुर पहुंचे। मानसिंह ने उन्हें Akbar की अधीनता स्वीकार करने की सलाह दी। लेकिन प्रताप ने दृढ़ता पूर्वक अपनी स्वाधीनता बनाए रखने की घोषणा की और युद्ध में सामना करने की घोषणा भी कर दी। मानसिंह के उदयपुर से खाली हाथ आ जाने को बादशाह ने करारी हार के रूप में लिया तथा अपनी विशाल सेना को मानसिंह और आसिफ खां के नेतृत्व में मेवाड़ पर आक्रमण करने के लिए भेज दिया। आखिरकार 30 मई 1576 को बुधवार के दिन प्रातः काल में Haldighati के मैदान में विशाल मुगलिया सेना और रणबांकुरे मेवाड़ी सेना के मध्य भयंकर युद्ध छिड़ गया। मुगलों की विशाल सेना टिड्डी दल की तरह मेवाड़ भूमि की ओर उबड़ पड़ी। उस में मुगल, राजपूत और पठान योद्धाओं के साथ जबरदस्त तोप खाना भी था। Akbar के प्रसिद्ध सेनापति महावत खान, आसिफ खान, राजा मानसिंह के साथ शहजादे सलीम भी उस विशाल मुगल सेना का संचालन कर रहे थे, जिसकी संख्या इतिहासकार 80000 से 100000 तक बताते हैं। इस युद्ध में प्रताप अभूतपूर्व वीरता और साहस से मुगल सेना के दांत खट्टे कर दिए और Akbar के सैकड़ों सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया। विकट परिस्थिति में झाला सरदारों के वीर पुरुष ने उनका मुकुट और छत्र अपने सिर पर धारण कर लिया। मुगलों ने उसे ही प्रताप समझ लिया और वह उसके पीछे दौड़ पड़े। इस प्रकार उन्होंने राणा को युद्ध क्षेत्र से निकल जाने का अवसर प्रदान कर दिया। बाद में Haldighati के युद्ध में करीब 20,000 राजपूतों को साथ लेकर Maharana Pratap ने मुगल सरदार राजा मानसिंह के 80000 सेना का सामना किया। इसमें Akbar ने अपने पुत्र सलीम यानी कि जहांगीर को युद्ध के लिए भेजा था। जहांगीर को भी मुंकी खानी पड़ी और वह भी युद्ध का मैदान छोड़कर भाग गया। बाद में सलीम ने अपनी सेना को एकत्रित कर फिर से Maharana Pratap पर आक्रमण किया और इस बार एक भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में Maharana Pratap का प्रिय घोड़ा चेतक घायल हो गया। राजपूतों ने बहादुरी के साथ मुगलों का मुकाबला किया परंतु मैदानी तोपों तथा बंदूकधारियों से सुसज्जित शत्रुऔं के विशाल सेना के सामने समूचा पराक्रम निष्फल रहा। युद्ध भूमि पर उपस्थित 22000 राजपूत सैनिकों में केवल 8000 ही जीवित रह पाए। Maharana Pratap को जंगल में आश्रय लेना पड़ा।

 Maharana Pratap के सबसे प्रिय घोड़े का नाम चेतक था। चेतक बहुत ही समझदार और स्थिति को पल में ही भाब जाने वाला घोड़ा था। उसने कई मौकों पर Maharana Pratap की जान बचाई थी। Haldighati के युद्ध के दौरान प्रताप अपने पराक्रमी चेतक पर सवार होकर पहाड़ की ओर जा रहे थे। तब उनके पीछे दो मुगल सैनिक लगे हुए थे। चेतक ने तेज रफ्तार पकड़ ली, लेकिन रास्ते में एक पहाड़ी नाला बह रहा था। युद्ध में घायल चेतक 21 फुट चौड़े इस नाले को फुर्ती से छलांग लगया, परंतु मुगल उसे पार न कर पाए। हालांकि चेतक इस लंबी छलांग से बुरी तरह घायल हो गया था। पर महाराणा को सही सलामत पहुंचा दिया और शहीद होकर यादों में अमर हो गया।

 Maharana Pratap का Haldighati के युद्ध के बाद का समय पहाड़ों और जंगलों में ही व्यतीत हुआ। अपनी गुरिल्ला युद्ध नीति द्वारा उन्होंने Akbar को कई बार मात दी थी। Maharana Pratap चित्तौड़ छोड़कर जंगलों में रहने लगे। घास की रोटियां और पोकरों के पानी पर ही आश्रित थे। अरावली की गुफाएं ही अब उनका आवाज थी और शीला ही सैया थी। मुगल चाहते थे कि Maharana Pratap किसी भी तरह Akbar की अधीनता स्वीकार कर ले और दीन-ए-इलाही का धर्म अपना ले। इसके लिए उन्होंने Maharana Pratap तक कई प्रलोभन संदेश भेजबाये। लेकिन Maharana Pratap अपने निश्चय पर अडिग रहे। कई छोटे राजाओं ने Maharana Pratap से अपने राज्य में रहने की गुजारिश की। लेकिन मेवाड़ की भूमि को मुगल आधिपत्य से बचाने के लिए Maharana Pratap ने प्रतिज्ञा की थी कि जब तक मेवाड़ आजाद नहीं होगा वह महलों को छोड़कर जंगलों में निवास करेंगे। स्वादिष्ट भोजन को त्याग कर कंदमूल और फलों से ही पेट भरेंगे, लेकिन Akbar का आधिपत्य कभी स्वीकार नहीं करेंगे। जंगल में रहकर ही Maharana Pratap ने भिलों की शक्ति को पहचान कर छापामार युद्ध पद्धति से अनेक बार मुगल सेना को कठिनाइयों में डाला था। बाद में मेवाड़ के गौरव भामाशाह ने महाराणा के चरणों में अपनी समस्त संपत्ति रखदी।भामाशाह ने 20 लाख आसर्फियां और 25 लाख रुपेय महाराणा को भेंट किए। महाराणा इस प्रचुर संपत्ति से  पूणः सैन्य संगठन में लग गए। इस अनुपम सहायता से प्रोत्साहित होकर महाराणा ने अपने सैन्य बल का पुनर्गठन किया तथा उनकी सेना में नवजीवन का संचार हुआ। Maharana Pratap ने पुणः कुंभलगढ़ पर अपना कब्जा स्थापित करते हुए शाही फौजों द्वारा स्थापित स्थानो और ठिकानों पर अपना आक्रमण जारी रखा। बाद में मुगल बादशाह Akbar ने एक और विशाल सेना शाहबाज खान के नेतृत्व में मेवाड़ भेजी। इस विशाल सेना ने कुंभलगढ़ ओर केलवाड़ा पर कब्जा कर लिया था तथा गोगुंदा और उदयपुर क्षेत्र में लूटपाट की। ऐसे में Maharana Pratap ने विशाल सेना का मुकाबला जारी रखते हुए अंत में पहाड़ी क्षेत्र में पनहा लेकर स्वयं को सुरक्षित रखा और चावंड पर पुनः कब्जा प्राप्त किया। शाहबाज खान एक बार फिर अखबार के पास खाली हाथ लौटा। चित्तोड़ को छोड़कर महाराणा ने अपने समस्त दुर्गों का शत्रु से पुनरुद्धार कर लिया और उदयपुर को उन्होंने अपनी राजधानी बनाया। विचलित मुगलिया सेना के घटते प्रभाव और अपनी आत्मशक्ति के बूते महाराणा ने चित्तौड़गढ़ एवं मांडलगढ़ के अलावा संपूर्ण मेवाड़ पर अपना राज्य पुणः स्थापित कर लिया। इसके बाद मुगलों ने कई वार Maharana Pratap को चुनौती दी, लेकिन मुगलों को मुंकी खानी पड़ी। आखिरकार युद्ध और शिकार के दौरान लगी चोटों की वजह से Maharana Pratap की मृत्यु 29 जनवरी, 1597 को चावंड में हुई।



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