Mystery of Kedarnath Temple | केदारनाथ मंदिर के रहस्य

 

 
          
 उत्तराखंड में हिमालय पर्वत की गोद में केदारनाथ मंदिर 12 ज्योतिर्लिंगों में सम्मिलित होने के साथ-साथ चारधाम, और पंच केदार में से भी एक है। यहां के मुश्किल मौसम के कारण यह मंदिर अप्रैल से नवंबर महीने के बीच ही खुलता है। कत्तोरी शैली में बने पत्थरों के इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण पांडव वंश के राजा जनमेजय ने कराया था। यहां स्थित स्वयंभू शिवलिंग अति प्राचीन है। कहा जाता है कि आठवीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। जून 2013 के दौरान भारत के उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश राज्यों में अचानक आई बाढ़ और भूस्खलन के कारण केदारनाथ सबसे अधिक प्रभावित रहा। इस ऐतिहासिक मंदिर का मुख्य हिस्सा और सदियों पुराना गुंबद सुरक्षित रहा, लेकिन मंदिर का प्रवेश द्वार और उसके आसपास का इलाका पूरी तरह तबाह हो गया। केदारनाथ मंदिर समुद्र तल से 11755 फीट की ऊंचाई पर स्थित है।

 दोस्तों जान लेते हैं किस तरह 400 सालों तक केदारनाथ का मंदिर वर्फ मे दवा रहा , ओर मंदिर पर इसका क्या असर पड़ा। वैज्ञानिकों के अनुसार केदारनाथ मंदिर 400 सालों तक वर्फ मे दवा रहा, फरभी इस मंदिर को कुछ नहीं हुआ, इसीलिए 2013 मे बाढ़ के दौरान इस मंदिर को कुछ ना होने पर वैज्ञानिकों को कोई हैरानी नहीं हुई। देहरादून के Wadia institute के हिमालयन जूलॉजिकल विजय जोशी ने कहा कि 400 साल तक केदारनाथ मंदिर वर्फ के अंदर दवे रहने के बावजुद सुरक्षित रहे, लेकिन जैसेही वर्फ पिछे हटी उसके निशान मंदिर में मौजूद थे, जिसकी के आधार पर यह पता लगा 400 सालों तक बर्फ में दबा हुआ था। जोशी कहते हैं कि 13 विं से 17 विं शताव्दि तक यानी 400 साल तक एक हिमयुग  आया था, जिसमें हिमालय का एक बड़ा क्षेत्र बर्फ के अंदर दब गया था। पहले माना जाता था कि मंदिर ग्लेशियर के अंदर है, लेकिन रिसर्च से पता चला कि यह मंदिर ग्लेशियर के अंदर नेही बल्कि वर्फ में ही दबा हुआ था। वैज्ञानिकों के अनुसार मंदिर की दीवार और पत्थरों पर आज भी उसके निशान है, यह निशान ग्लेशियर के रगड़ से बने हैं। ग्लेशियर हर वक्त खिसकते रहते हैं, वो ना सिर्फ सकते हैं बल्कि उनके साथ उनका वजन भी होता है, साथ ही कई चट्टानी भी उनके साथ होती हैं जिसके कारण उनके मार्ग में आई हर वस्तु रगड़ खाती हुई चली जाती है। जब 400 साल तक मंदिर बर्फ में दबा रहा होगा तो सोचिए मंदिर ग्लेशियर के वर्फ और पत्थर को कितना झेला होगा। वैज्ञानिकों के अनुसार मंदिर के अंदर भी उसके निशान दिखाई देते हैं। बाहर की ओर की दीवारों पर पत्थरों के रखती है तो अंदर की दीवारों पर पत्थर समतल है जैसे उनकी पॉलिश की गई हो। एक मत के अनुसार विक्रम संवत 1076 से 1099 तक राज करने वाले मालवा के राजा भोज ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था, लेकिन कुछ लोगों के अनुसार यह मंदिर आठवीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य ने बनवाया था। बताया जाता है कि मौजूदा केदारनाथ मंदिर के ठीक पीछे पान्डवो ने एक मंदिर बनवाया था, लेकिन यह मंदिर वक्त के थपेड़ों की मार सह नहीं पाये। वैसे गढ़वाल विकास निगम के अनुसार मौजूदा मंदिर आदि शंकराचार्य ने आठवीं शताब्दी में बनवाया था, यानी हिमयुग के दौरान जो कि 13 विं शताब्दी में शुरू हुआ था उससे पहले ही मंदिर वन चुका था। Wadia institute के वैज्ञानिकों ने केदारनाथ इलाके की Lichonometric dating भी की। इस तकनीक के अनुसार केदारनाथ के इलाके में ग्लेशियर का निर्माण 14विं सदी के मध्य में शुरू हुआ और इस घाटी में ग्लेशियर वनना 1748 तक जारी रहा, यानी तकरिबन 4000 सालों तक। जोशी ने कहा कि लाखों साल पहले चोरावारि  पीछे हटने से केदार घाटि वनी। यव ग्लेशियर पीछे हटते हैं अपने नीचे की सारी चट्टानों को रोड रोलार के तरह पीस देते हैं, और साथ में बड़ी-बड़ी चट्टानों के टुकड़े छोड़ जाते हैं। जोशी कहते हैं कि ऐसी जगह पर मंदिर बनाना engineering की एक अद्भुत नमुना है। उन्होंने एसी जगह मंदिर वनाय़ा है कि आज तक नुकसान नहीं हुआ। वैज्ञानिक Dr. R.K. Doval भी इस बात को मानते हैं कि यह मंदिर बहुत ही मजबूती से बनाया गया है। केदारनाथ मंदिर 85 फीट ऊंचा, 187 फीट लंबा, 80 फीट चौड़ा है। इसकी दीवारें 12 फीट मोटी है , ओर वेहद मजवुत पत्थरों से बनाई गई है। मंदिर को 6 फीट ऊंचे चबूतरे पर खड़ा किया गया है। यह भी एक हैरान करने वाली बात है कि इतने भारी भरकम पत्थरों को इतनी ऊंचाई पर लाकर और तराश कर कैसे एक मंदिर की शक्ल दी गई होगी। जानकारों का मानना है कि पत्थरों को एक दूसरे से जोड़ने के लिए इंटरलॉकिंग तकनीक का इस्तेमाल किया गया था, इसी वजह से यह मंदिर एक भूकंप रोधी इमारत में तब्दील हो गया। यह मजबूती और तकनीकी मंदिर को नदी के बीचो-बीच खड़े रखने में कामयाब हुई


How to end Harappa | Harappan civilization history

 



अक्सर पुरानी इमारते अपनी कहानियां बताती है। लगभग 150 साल पहले जब पंजाब में पहली बार रेलवे लाइनें बिछाई जा रही थी, तो इस काम में जुटे इंजीनियरों को अचानक हड़प्पा पुरास्थल मिल गया, जो आधुनिक पाकिस्तान में है। उन्होंने सोचा की य़ह एक ऐसा खंडहर है जहां से अच्छी ईंटे मिलेंगे। यह सोचकर वे हड़प्पा के खंडहरों से हजारों ईंटे उखाड़ कर ले गए, जिससे उन्होंने रेलवे लाइनें बिछाने शुरू कर दी। इस कारण कई इमारतें पूरी तरह नष्ट हो गई। इसके बाद 1920 में शुरुआती पुरातत्व ने इस स्थल को ढूंढा और पता चला कि यह अंडर उपमहाद्वीप के सबसे पुराने शहरों में से एक था, क्योंकि इस इलाके का नाम हड़प्पा था इसीलिए बाद में यहां से मिलने वाली सभी पुरातात्विक वस्तुओं और इमारतों का नाम हड़प्पा सभ्यता के नाम पर पड़ा। ईन नगरों का निर्माण लगभग 4700 साल पहले हुआ था।

 

  इन नगरों में से कई को दो या उससे ज्यादा हिस्सों में विभाजित किया गया था। पश्चिमी भाग छोटा था लेकिन ऊंचाई पर बना हुआ था, और पूर्वी हिस्सा बड़ा था, लेकिन यह निचले हिस्से में था। ऊंचाई वाले भाग को पूरातत्व विदों ने नगर दुर्ग कहा है, और निचले हिस्से को निचला नगर। दोनों हिस्सों की चारदीवारें पाकि हुई ईटों से बनाई गई थी। ईंटे इतनी अच्छी तरह पाकि थी कि हजारों साल बाद आज तक उनकी दीवारे खड़ी रही। दीवार बनाने के लिए ईंटे की चुनाइ इस तरह करते थे जिससे की दीवारें सालों साल मजबूत रहे। कुछ नगरों के नगर दुर्ग में कुछ खास इमारते बनाई गई थी। मिसाल के तौर पर मोहनजोदड़ो में एक खास तालाब बनाया गया था, जिसे पुरातत्व विदो ने महान स्नानागार कहा था। इस तालाब को बनाने में ईंट ओर प्लास्टर का इस्तेमाल किया गया था, इसमें पानी का रिसाव रोकने के लिए प्लास्टर के ऊपर चारकोल की परत चढ़ाई गई थी। इस सरोवर में दो तरफ से उतरने के लिए सीढ़ियां बनाए गए थे, और चारों और कमरे बनाए गए थे। इसमें भरने के लिए पानी कुंय़े से निकाला जाता था, उपयोग के बाद इसे खाली कर दिया जाता था। साय़द इहां विशिष्ट नागरिक विशेष अवसरों पर स्नान किया करते थे। कालीबंगा और लोथल जैसे अन्य नगरों में अग्निकुंड भी मिले है। यहां संभवत यज्ञ किया जाते होंगे। मोहनजोदड़ो और लोथल नगरों में बड़े-बड़े भंडार गृह भी मिले। यहां के घर आमतौर पर एक या दो मंजिलें होते थे। घर के आंगन के चारों ओर कमरे बनाए जाते थे, इसके अलावा अधिकांश घरों में अलग-अलग स्नानागार भी होते थे, और कुछ घरों में तो कुए भी होते थे। कई नगरों में ढके हुए नाले थे इन्हें सावधानी से सीधी लाइन में बनाया गया था। हर नाली में हल्की ढलान होती थी ताकि पानी आसानी से या सके। अक्सर घरों के नालियों को सड़कों की नालियों से जोड़ दिया जाता है, जो बाद में बड़े बड़े नालों में मिल जाती थी। नालों के ढाके होने के कारण इनमें जगह-जगह पर मेनहोल बनाए गए थे जिनके जरिए इनकी देखभाल और सफाई की जा सके। घर नाली और सड़कों का निर्माण योजनाबद्ध तरीके से एक साथ ही किया जाता था। इन सभी बातों को देखते हुए पता चलता है कि हड़प्पा सभ्यता  4500 साल पहले भी कितनी विकशित थे।

 

 नगरीय जीवन हड़प्पा के नगरों में बड़ी हलचल रहा करती होगी। यहां पर ऐसे लोग रहते होंगे जो नगर की खास इमारतें बनाने की योजना में जुटे रहते थे। यह संभवत यहां के शासक थे यह भी संभव है कि यह शासक लोगों को भेजकर दूर-दूर से धातु बहुमूल्य पत्थर और अन्य उपयोगी चीजें मंगवाते थे। साय़द शासक लोद खूबसूरत मनकों तथा सोने चांदी से बने आभूषणों जैसी कीमती चीजों को अपने पास रखते होंगे। इन नगरों में भी लिपिक भा होते थे, जो मोहरों पर तो लिखते ही थे और शायद अन्य चीजों पर भी लिखते होंगे, जो बच नहीं पाई है। इसके अलावा नगरों में शिल्पकार भी रहते थे जो अपने घर हो या किसी अन्य स्थल पर तरह-तरह की चीजें बनाते होंगे। लोग लंबी यात्राएं भी करते थे और वहां से उपयोगी वस्तुएं लाते थे। इसके साथ ही वे अपने साथ लाते थे सुदूर देशों की किस्से कहानियां। हड़प्पा सभ्यता की खुदाई के दौरान मिट्टी से बने खिलौने भी मिले हैं जिससे उस समय के बच्चे खेला करते होंगे।

  पुरातत्व विदों को जो चीजें मिली है उनमें अधिकतर पत्थर शंख, ताम्वे, कांसे, सोने और चांदी जैसी धातुओं से बनाई गई थी। ताम्वे और कांसे से हथियार, गहने और बर्तन बनाए जाते थे। यहां मिली सबसे आकर्षक वस्तुओं में मनके बाट और फलक है। हड़प्पा सभ्यता के लोग पत्थर से मोहरे बनाया करते थे। इन आय़ताकार मोहरों पर सामान्यत जानवरों के चित्र मिलते हैं। हड़प्पा सभ्यता के लोग लाल मिट्टी के बर्तन बनाते थे जिन पर काले रंग के खूबसूरत डिजाइन भी बने होते थे। हड़प्पा में लोगों को कई चीजें वही मिल जाया करते थे, लेकिन तांबा लोहा सोना चांदी और बहुमूल्य पदार्थों का दूर-दूर से आयात करते थे। हड़प्पा के लोग तांबा साय़ग आजके राजस्थान से करते थे। यहां तक कि पश्चिमी एशियाई देश ओमान से भी तांबे का आयात किया जाता था। कंसा बनाने के लिए तांबे के साथ मिलाई जाने वाली धातु तिनका आयात आधुनिक ईरान और अफगानिस्तान से किया जाता था। सोने का आयात आधुनिक कर्नाटक और बहुमूल्य पत्थर का आयात गुजरात, ईरान और अफगानिस्तान से किया जाता था। यानी कि हड़प्पा सभ्यता के लोग हजारों साल पहले आयात और निर्यात के द्वारा व्यापार भी किया करते थे। लोग नगरों के अलावा गांव में भी रहते थे, जो आनाज उगाते थे और जानवर पालते थे। किसान और चरवाहे शहरों में रहने वाले शासकों, लेखकों और दस्त कारों को खाने के सामान देते थे। पौधों के अवशेषों से पता चलता है कि हड़प्पा के लोग गेहूं, डाले, मटर, तिल और सरसों आदि उगाते थे। उस समय जमीन की जुताई के लिए हाल का प्रयोग एक नई बात थी। हड़प्पा काल के हाल तो नहीं बच पाए हैं क्योंकि वे प्राय लकड़ी से बनाए जाते थे, लेकिन हाल की आकार के खिलौने मिले हैं इससे यह साबित होता है कि उस समय खेती के लिए हालो का प्रयोग भी किया जाता था। हड़प्पा के लोग गाय भैंस भेड़ और बकरियों पालते थे। बस्तियों के आसपास तालाब और चारागाह होते थे, लेकिन सूखे महीनों में मवेशियों के झंडों को चारा पानी की तलाश में दूर-दूर तक ले जाया जाता था। वे फलों को इकट्ठा करते थे मछलियां पकड़ते थे और हिरण जैसे जानवरों का शिकार भी किया करते थे।

 

  कच्छ के एलाके मे खादिर वेद के किनारे धौलावीरा नगर बसा था। वहां साफ पानी मिलता था और जमीन उपजाऊ थी। जहां हड़प्पा सभ्यता के कई नगर कई भागों में विभक्त थी, वहीं धौलावीरा नगर को तीन भागों में बांटा गया था। इसके हर हिस्से के चारों ओर पत्थर की ऊंची ऊंची दीवार बनाई गई थी। इसके अंदर जाने के लिए बड़े-बड़े प्रवेश द्वार थे। इस नगर में खुला मैदान भी था जहां सार्वजनिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते थे। यहां मिले कुछ अवशेषों में हड़प्पा लिपि के बड़े बड़े अक्षरों को पत्थरों में खुदा पाया गया था। इन अभिलेखों को संभवतय लकड़ी में जड़ा गया था। यह एक अनोखा अवशेष है क्योंकि आमतौर पर हड़प्पा के लेख मुहर जैसी छोटी वस्तुओं पर ही पाए जाते हैं। गुजरात की खंभात की खाड़ी में मिलने वाली साबरमती एक उपनदी के किनारे बसा लोथल नगर ऐसे स्थान पर बसा था जहां कीमती पत्थर जैसा कच्चा माल आसानी से मिल जाता था। यह पत्थरों, शंख और धातुओं से बनाई गई चीजों का एक महत्वपूर्ण केंद्र था। इस नगर में एक भंडार गृह भी था, यहां पर एक इमारत भी मिली है। जहां संभवतय़ मनके बनाने का काम होता था। पत्थर के टुकड़े आधे अधूरे मनके, मनके बनाने वाले उपकरण और पूरी तरह तैयार मनके भी यहां मिले हैं।

  

 लगभग 3900 साल पहले एक बड़ा बदलाव देखने को मिलता है। अचानक लोगों ने ईन नगरों को छोड़ दिया, लेखन मोहर और बांटे का प्रयोग बंद हो गया, दूर-दूर से कच्चे माल का आयात भी काफी कम हो गया था। मोहनजोदड़ो में सड़कों पर कचरे के ढेर बनने लगे, जल निकास प्रणाली नष्ट हो गए और सड़कों पर ही जोगी नुमा घर बनाए जाने लगे। आखिर यह सब क्यों हुआ यह आज भी एक रहस्य है। कुछ विद्वानों का कहना है कि नदियां सूख गई थी, अन्य का कहना है कि जंगलों का विनाश हो गया था, इसका कारण यह हो सकता है कि ईंटे पकाने के लिए ईनधन की जरूरत पड़ती थी जिसके लिए उन्होंने जंगलों को काटा होगा। इसके अलावा मवेशियों के बड़े-बड़े झंडों से चारागाह और घास वाले मैदान समाप्त हो गए होंगे, कुछ इलाकों में बाढ़ आ गई, लेकिन इन कारणों से यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि सभी नगरों का अंत कैसे हो गया, क्योंकि बाढ़ और नदियों के सूखने का असर तो कुछ ही लाखों में हुआ होगा। ऐसा लगता है कि उस समय के शासकों का नियंत्रण समाप्त हो गया था। खैर जो भी हुआ हो परिवर्तन का असर बिल्कुल साफ दिखाई देता है। आधुनिक पाकिस्तान के सिंध और पंजाब की बस्तीयां उजड़ गई थी। कई लोग पूर्व और दक्षिण के ईलाकों में नई और छोटी बस्तियों में जाकर बस गए। इसके लगभग 1400 साल बाद नए नगरों का विकास हुआ।

 

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History of Mesopotamia | Sumerian and Assyrian civilization

 




इतिहासकारों का मत है कि शहरी जीवन की शुरुआत मेसोपोटामिया से हुई थी। फरहात यानी यूफिरत और दजला यानी टीग्रिस नदियों के बीच स्थीतीय प्रदेश आजकल इराक गड़राज्य का हिस्सा है। मेसोपोटामिया की सभ्यता अपनी संपन्नता, शहरी जीवन, विशाल एवं समृद्ध साहित्य, गणित और खगोल विद्या के लिए प्रसिद्ध है। मेसोपोटामिया के लेखन प्रणाली और उसका साहित्य पूर्वी भूमध्यसागरीय प्रदेशों और उत्तरी सीरिया तथा तुर्की में 2000 ईसा पूर्व के बाद फैहला। इजिप्ट के फिर उसके साथ भी मेसोपोटामिया की भाषा और लिपि में लिखा पढ़ी होने लगी। अभी लिखित इतिहास के आरंभिक काल में इस प्रदेश को मुख्यतः इसके शहरी के दक्षिणी भाग को सुमिरो अक्कद कहा जाता था। दो हजार ईसा पूर्व के बाद जब बेबीलोन का एक महत्वपूर्ण शहर बन गया तब दक्षिणी क्षेत्र को बेबीलोनिया कहा जाने लगा। लगभग 1100 ईसा पूर्व से जब असीरियो ने उत्तर में अपना राज्य स्थापित कर लिया तब उस क्षेत्र को असीरिया कहा जाने लगा। उस प्रदेश की प्रथम ज्ञात भाषा सुमेरियन यानी  सुमेरी थी। धीरे-धीरे 2400 ईसा पूर्व के आसपास जब अक्कदी भाषा बोलने वाले लोग यहां आए, तव  सुमेरी भाषा का स्थान ले लिया। अक्कदी भाषा सिकंदर के समय तक कुछ क्षेत्रीय परिवर्तनों के साथ फलती फूलती रहे। 1400 ईसा पूर्व से धीरे-धीरे आरामाय़िक भाषा का भी प्रवेश शुरू हुआ। यह भाषा हिब्रू से मिलती जुलती थी, और 1000 ईसा पूर्व के बाद व्यापक रूप से बोली जाने लगी। यह आज भी इराक के कुछ भागों में बोली जाती है।

  इराक भौगोलिक विविधता का देश है। जिस के पूर्वोत्तर भाग में हरे भरे ऊंचे नीचे मैदान है, जो धीरे-धीरे एक पेड़ों से घिरी हुई पर्वत श्रंखला के रूप में फैलते गए। साथ ही यहां जंगली फूल भी है। यहां अच्छी फसल के लिए पर्याप्त वर्षा हो जाते हैं। यहां 7000 से 6000 ईसा पूर्व के बीच खेती शुरू हो गई थी। उत्तर में ऊंची भूमि है जहां स्टेपी घास के मैदान है। यहां पशुपालन खेती की तुलना में अधिक आजीविका का साधन है। मेसोपोटामिया के खाद्य संसाधन चाहे कितने भी समृद्ध रहे हो उसके यहां खनिज संसाधनों का अभाव था। दक्षिण के अधिकांश भागों में औजार, मोहरे और आभूषण बनाने के लिए पत्थरों की कमी नहीं थी। इराकी खजूर के पेड़ों की लकड़ी गाड़ियों के बनाने के लिए कुछ खास कारगर नहीं थे, और पथरिया गहने बनाने के लिए कोई धातु वहां उपलब्ध थी नहीं, इसलिए हमारे विचार से प्राचीन काल के मेसोपोटामिया की लोग संभवत लकड़ी, तांबा, चांदी, सोना, सीपी और विभिन्न प्रकार के पत्थरों को तुर्की और ईरान अथवा खाड़ी पार्क के देशों से मंगवाते थे, जिसके लिए बो अपना कपड़ा और कृषि उत्पाद काफी मात्रा में उन्हें निर्यात करते थे। इन देशों के पास खनिज संसाधनों की कोई कमी नहीं थी, मगर वहां खेती करने की बहुत कम गुंजाइश थी। इन वस्तुओं का नियमित रूप से आदान-प्रदान तभी संभव होता जब इसके लिए कोई सामाजिक संगठन होता, जो विदेशी अभियानो और भी नियमों को निर्देशित करने में सक्षम होता। दक्षिणी मेसोपोटामिया के लोगों ने ऐसे संगठन स्थापित करने की शुरुआत की। पुराने मेसोपोटामिया की लहरें और प्राकृतिक जल धाराएं छोटी-बड़ी बस्तियों के बीच माल के परिवहन का अच्छा मार्ग थे। इसीलिए इतिहासकारों का मानना है फैरात नदी उन दिनों व्यापार के लिए विश्व मार्क के रूप में काफी महत्वपूर्ण थी।

 सभी समाजों के पाश अपनी एक भाषा होती है, जिसमें उच्चरित ध्वनियां अपना अर्थ प्रकट करति है। इसे शाब्दिक अभिव्यक्ति कहते हैं। मेसोपोटामिया में जो पट्टी पाई गई है लगभग 3000 ईसा पूर्व की है। उनमें चित्र जैसे चिह्न ओर संख्य़ाय़ें दी गई है। बहां बैलों, मछलीय़ों और रोटीय़ें आदि की लगभग 5000 सूचना मिली है, जो वहां के दक्षिणी शहर उरु के मंदिरों में आने वाली और वहां के बाहर जाने वाली चीजों की रही होंगी। कहा जा सकता है कि लेखन कार्य भी शुरू हुआ जब समाज को अपने लेन-देन का हिसाब रखने की जरूरत पड़ी। क्योंकि शहरी जीवन में लेनदेन अलग-अलग समय पर होते थे, उन्हें करने वाले भी कई लोग होते थे और सौदा भी कई प्रकार के माल के बारे में होता था। मेसोपोटामिया के लोग मिट्टी की पट्टीका के ऊपर लिखा करते थे।लिपिक चिकनि मिट्टि को गीला करता था और फिर उसको गुंदकर और थापकर एक ऐसे आकार का रूप देता था जिसे वह आसानी से अपने हाथ में पकड़ सके। वह सावधानीपूर्वक उसकी सतह को चिकना बना देता था, और फिर सरकंडे की तीली की तीखी नोक से वह उसकी नम चिकनी सतह पर कीलाकार चिह्न जिन्हें क्योंनीफॉर्म(quniform) भी कहा जाता है बना देता था। इन मिट्टी की पट्टी गांव को धूप में सुखाकर मजबूत कर लिया जाता था, और वह मिट्टी के बर्तनों की तरह ही मजबूत होती थी। जब उन पर लिखा हुआ कोई हिसाब, जैसे धातु के टुकड़े सौंपने का हिसाब, असंगत या गैर जरूरी हो जाता था तो उस पट्टीका को फेंक दिया जाता था। ऐसी पट्टीका जब एक बार सूख जाती थी तो उस पर कोई नया अक्षर नहीं लिखा जा सकता था। इस प्रकार प्रत्येक लेनदेन के लिए चाहे वह कितना ही छोटा हो एक अलग पट्टिका की जरूरत होती थी, इसीलिए मेसोपोटामिया की खुदाई स्थलों पर हजारों पट्टीकाय़ें मिली, और स्त्रोत संपदा के कारण ही आज हम मेसोपोटामिया के बारे में इतना कुछ जान पाए।

 लगभग 2600 ईसा पूर्व के आसपास वर्ण किलाकार हो गए और भाषा सुमेरियन थे। अव लेखन का इस्तेमाल हिसाब-किताब रखने के लिए नहीं बल्कि शब्दकोश बनाने, भूमि के हस्तांतरण को कानूनी मान्यता प्रदान करने, राजाओं के कार्यों का वर्णन करने ,और कानून में उन परिवर्तनों को घोषित करने के लिए किया जाने लगा जो देश की आम जनता के लिए बनाए जाते थे। मेसोपोटामिया की सबसे पुरानी ज्ञात भाषा सुमेरियन का स्थान 2400 ईसापुर के बाद धीरे-धीरे अक्कदी भाषा ने ले लिया। भाषा में किलाकार लेखन का रिवाज ईस्वी सन् की पहली शताब्दी अर्थात 2000 से अधिक वर्षों तक चलता रहा। 5000 ईसा पूर्व से दक्षिण मेसोपोटामिया में बस्तियों का विकास होने लगा था। इन बस्तियों में से कुछ ने प्राचीन शहरों का रूप ले लिया। यह शहर कई तरह के थे, पहले जो मंदिरों के चारों और विकसित हुए, दूसरे जो व्यापार के केंद्रों के रूप में विकसित हुए ,और बाकी शाही शहर थे।  उरुक नाम का जो उन दिनों सबसे पुराने मंदिर नगरों में से एक था, उसे हमेशा शस्त्र वीरों और उनसे हताहत हुए शत्रुओं के चित्र मिलते हैं, और सावधानी पूर्वक किए गए पुरातात्विक सर्वेक्षण से पता चलता है कि 3000 ईसा पूर्व के आसपास जब उरूक नगर का 250 हेक्टेयर भूमि में विस्तार हुआ तो उसके कारण दर्जनों छोटे-छोटे गांव उजड़ गए, और बड़ी संख्या में आबादी का विस्थापन हुआ। उसका यह विस्तार शताब्दियों बाद फूले फले मोहनजोदड़ो के नगर से दोगुना था। यह भी उल्लेखनीय है कि नगर की रक्षा के लिए उसके चारों ओर काफी पहले ही एक सुदृढ़ प्राचीर बना दी गई थी। शासक के हुकुम से आम लोग पत्थर खोदने, धातु और खनज लाने, मिट्टी से ईंटे तैयार करने और मंदिर में लगाने, इसके अलावा सुदूर देशों में जाकर मंदिर के लिए उपयुक्त सामान लाने के कामों में जुटे रहते थे। इसकी वजह से 3000 ईसा पूर्व के आसपास उरूक में तकनीकी क्षेत्र में भी काफी प्रगति हुई। अनेक प्रकार शिल्पों के लिए कांसे का प्रयोग होता था। वास्तु विदों ने ईटों के स्तंभों को बनाना सीख लिया था। पृथ्वी के चारो और चंद्रमा की परिक्रमा के अनुसार 1 वर्षों को 12 महीने में विभाजन, 1 महीने का 4 हफ्तों में विभाजन ,1 दिन का 24 घंटों में, और 1 घंटे का 60 मिनट में विभाजन यह सब जो आज हमारी रोज की जिंदगी का हीस्सा है बो  मेसोपोटामिया के निवासियों से ही हमें मिला है। समय का यह विभाजन सिकंदर के उत्तराधिकारियों ने भी अपनाया। फिर रोन ओर इस्लाम की दुनिया को मिला, और फिर यूरोप में पहुंचा। जब कभी सूर्य और चंद्र ग्रहण होते थे तो बर्ष मांस और दिन के अनुसार उनके घटित होने का हिसाब रखा जाता था। इसी प्रकार रात को आकाश में तारों और तारामंडल की स्थितियों पर बराबर नजर रखते हुए उनका हिसाब रखा जाता था। मेसोपोटामिया वासियों की ईन महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक भी उपलब्धि संभव नहीं हो पाती यदि लेखन की कला और विद्यालय संस्थाओं का अभाव होता, जहां विद्यार्थीगण पुराने लोखन पढ़ते और उनकी नकल करते थे, और जहां कुछ छात्रों को साधारण प्रशासन का हिसाब-किताब रखने वाले लेखाकार ना बनाकर ऐसा प्रतिभा संपन्न व्यक्ति बनाया जाता था जो अपने पूर्वजों की बौद्धिक उपलब्धियों को आगे बढ़ा सके।

 

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Secret historical mystry of Tajmahal | Why Shah Jahan cut labour's hand ?

 


दुनिया के सात अजूबों का नाम सुनते ही सबके दिमाग में दुनिया की सबसे खूबसूरत इमारतों में से एक ताजमहल का चित्र उभर आता है। इसे मुगल बादशाह शाहजहां ने अपनी बेगम मुमताज महल की याद में बनवाया था शायद इसी कारण इसे आज पूरी दुनिया में प्रेमी जोड़ों के द्वारा प्यार की अद्भुत मिसाल के तौर पर देखा जाता हैइस व्लग में हमने इस अद्भुत इमारत के बारे में ऐसे आश्चर्यजनक तथ्यों के बारे में बताया है जिन्हें बहुत ही कम लोग जानते हैं

 1. मुमताज महल के मकबरे की छत पर एक छेद है, हालांकि छेद के पीछे कई तरह की कहानियां प्रसिद्ध है जबकि सच्चाई यह है कि जब शाहजहां ने ताजमहल के पूरा बन जाने के बाद सभी मजदूरों के हाथ काट दिए जाने की घोषणा की, ताकि वह कोई और ताजमहल ना बना सके। तो मजदूरों ने इसी छत में एक ऐसी कमी छोड़ दी जिससे कि शाहजहां से बदला लिया जा सके और यह मार्ग ज्यादा दिन ना टीक सके आज भी छेद के कारण मुमताज महल का मकबरा नमी से ग्रसित रहता है।

 2. यदि यमुना नदी नहीं होती तो क्या होता, ताजमहल का आधार एक ऐसी लकड़ी पर बना हुआ है जिसको मजबूत बना रहने के लिए नमी की जरूरत होती है। यदि ताजमहल के बगल में यमुना नदी ना रही होती तो यह लकड़ी मजबूत नहीं होती। आपको बता दें कि यह लकड़ी नदी के पानी सेरोकती है, इसीलिए अगर यमुना नदी नहीं होती तो अभी तक ताजमहल ना होता।

  3 .ताजमहल के चारों ओर के मीनार एक दूसरे की ओर झुके हुए हैं , ऐसा इसलिए है ताकि भूकंपीय बिजली के गिरने की हालत में मीनार को मुख्य मार्ग पर गिरने से बचाया जा सके।

 4. कुतुब मीनार से भी लंबा है ताजमहल, वैसे तो कुतुबमीनार को भारत की सबसे लंबी मीनार के तौर पर जाना जाता है, जिसकी ऊंचाई 72.5 मीटर है लेकिन क्या आप जानते हैं कि ताजमहल की ऊंचाई 73 मीटर है अर्थात ताज महल कुतुब मीनार से आधा मीटर अधिक पहुंचा है।

  5. आप यह जानकर चौक जाएंगे कि ताजमहल में लगे सभी फव्वारे एक साथ ही काम करते हैं दरअसल हर फव्वारे के नीचे एक टंकी लगी है जो कि एक ही समय भर्ती है और दबाव बनने पर पानी ऊपर फेंक दी है। यह सभी फव्वारे बिना किसी मशीन या मोटर के पानी फेकते हैं द्वितीय विश्व युद्ध ,भारत पाकिस्तान युद्ध के बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने ताजमहल के चारों ओर बांस का घेरा बनाकर उसे हरे रंग की चादर से ढक दिया था , जिससे कि यह दुश्मन को दिखाई ना दे और इस पर हमला ना किया जा सके।

 6.एक खबर यह भी है कि से बनाने वाले मजदूरों के हाथ काट दिए गए थे ताकि वे ऐसी कोई और इमारत ना बना सके, लेकिन शाहजहां अपने इरादे में कामयाब ना हो सका क्योंकि ताजमहल के बाद भी कई अन्य भव्य इमारतें बनवाई गई थी। इन्हें उस्ताद अहमद लाहौरी जिन्होंने दिल्ली के लाल किले को बनाने में काफी मदद की थी

 7. ताजमहल की कलाकृति में पत्थरों को लगाया गया था जो कि किसी की भी आंखों को चओका सकते थे। यह पत्थर चीन तिब्बत और श्रीलंका से मंगवाए गए थे, लेकिन अंग्रेजों ने कीमती पत्थरों को निकाल दिया था

  8. 32 से सोलन की अवधि में जब ताजमहल बना था तब इस पर 32 मिलियन रुपए खर्च हुए थे जिनकी वर्तमान कीमत $800000 है। शाहजहां का यह सपना था कि वह अपने लिए भी एक काला ताजमहल बनवाएं, लेकिन उसके बेटे औरंगजेब द्वारा कैद किए जाने के कारण वह अपना सपना पूरा ना कर सका।

 9. ताजमहल के साथ सेल्फी और नामक व्यक्ति ने ली थी यह सेल्फी ली गई थी जब सेल्फी का दौर ही नहीं था   

10. ताजमहल का रंग बदलता है दिन के अलग-अलग समय के हिसाब से इसका रंग बदलता है। सुबह के समय यह गुलाबी दिखता है और शाम को दूधिया सफेद और चांदनी रात में सुनहरा दिखाई देता है।

 ताजमहल को देखने के लिए 1 दिन में 12000 सैलानी आते हैं। सैलानी पूरी दुनिया में किसी भी इमारत को देखने के लिए नहीं आते